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    रुआंसी आंखें जुबां खामोश है

  • Raj Kumar Kapoor
    Raj Kumar Kapoor
    • Posted on November 7
    रुआंसी आंखें जुबां खामोश है
    रुआंसी सी हैं आंखें जुबां खामोश है
    अजीब मंजर है आलमे तन्हाई का
    दिल के कोने में कहीं दबा बैठा है
    ख्याले अहसास तेरी गजल रुबाई का
    मिलते ही नजर वो दूसरी तरफ देखते हैं
    धीरे धीरे असर हो रहा है लगाई बुझाई का
    सरकारी कुर्सियों का रौब गांठ रहे हैं
    जैसे रुतबा हो जमाई का
    इलाज की अभी दरकार है
    पर्चा कब लिखोगे दवाई का
    अलग जातियां और उनके ताने बाने
    अपने से लगने लगे हैं बेगाने
    फसल का नफा नुकसान देखकर
    तय करेंगे हिस्सा हम बटाई का
    राज स्वाद भी फीका पड़ता जा रहा है
    हलवाई के रसगुल्ले रबड़ी और रसमलाई का
    राज कुमार कपूर
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