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    धरती पुकारती

  • Akshay Bhandari
    Akshay Bhandari
    • Posted on April 25, 2015
    धरती पुकारती

    धरती पुकारती
    इतना क्यों नहीं कर सकते
    मैने मेरी गोद में पाला
    क्यों नहीं सुख चैन से रह सकते
    मैं माॅ तुम्हारी मैं अम्मा,मै मदर
    किस तरह कर दिया मेरा जीना इस कदर
    देखो जरा मुझ पर धरती की पुकार है
    प्रकृति से चारो ओर छेडछाड़ है
    मेरा जागना यह सबक ना आगे समझो तो
    करती हू धक-धक
    ओर आ जाती है प्राकृतिक आपदा
    पापाचार - अत्याचार बन्द करो
    धरती पुकारती थोड़ा शर्म करो
    कुछ तो राष्ट्रधर्म करो
    बस इतना कहकर
    आखिरि शब्द में जवाब दिया
    मेरी गोद में ईश्वर बसे है ओर ,
    महापुरुष,और वीर- वीरांगना यहा जन्मे है
    उनके विचार जग जग में फैले है
    फिर भी मानव क्यो करता इतने छमले है।

    मेरे द्वारा स्वरिचत है
    युवा पत्रकार अक्षय आजाद भण्डारी राजगढ़ (धार) मध्यप्रदेश।
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