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    कविता

  • Akshay Bhandari
    Akshay Bhandari
    • Posted on June 27, 2015
    कविता


    उठकर जीना यही मेरी आदत है जिदंगी में कुछ लिख दू यही मेरी चाहत है पर परिवार मेरे दर्द को समझ नहीं सके यही मेरी जिदंगी में रुकावट है।

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    अम्बर से बादल की मुलाकात हो गई

    बारिश में हवा तुफान हो गई

    हर तरफ हवा में बिखरने लगे पतझड़

    देखो जैसे मातृभूमि पर पत्तो की बारिश हो गई।





    मेरे द्वारा स्वरचित रचनाए

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