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    नई तकनीक :

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on March 9, 2018
    नई तकनीक :


    ● छत्तीसगढ़ में किसानों के लिए सुविधा -

    दुर्ग-भिलाई : धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में, यहॉ के किसानों के लिए राज्य सरकार ने कई नई तकनीक विकसित कर, इसे किसानों के बीच लाने का काम कर रही हैै ।
    जानकारी के अनुसार, अब फसल कटने के बाद खेतों में बचे अवशेषों को ना जला कर उनके सुरक्षित प्रबंधन के लिए राज्य सरकार किसानों को एक हजार रूपए प्रति एकड़ की आर्थिक सहायता देगी । नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा खेतों में फसलों के कटने के बाद बचे अवशेषों को जलाने पर लगे प्रतिबंध के बाद सरकार ने यह व्यवस्था की है ।
    राज्य शासन द्वारा इस संबंध में नया रायपुर स्थित मंत्रालय, कृषि विभाग से अधिसूचना भी जारी कर दी गई है । सरकार अब किसानों को फसल अवशेषों के सुरक्षित प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार कर किसानों को फसल अवशेष नहीं जलाने के लिए प्रेरित करने के संबंध में कार्यवाही करने के निर्देश सभी जिला कलेक्टर कार्यालयों को भी जारी किए हैं । योजना के क्रियान्वयन के लिए कृषि विभाग के जिला स्तरीय कार्यालय को नोडल विभाग के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई है ।
    राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा खेतों में फसलों के कटने के बाद बचे अवशेषों को जलाने पर पिछले वर्ष से प्रतिबंध लगा दिया गया है । खेतों में बचे फसल अवशेषों को जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को संज्ञान में लेते हुए ट्रीब्यूनल द्वारा यह आदेश जारी किया गया है । खेतों में फसल अवशेषों के समुचित निपटान के लिए होने वाले अतिरिक्त खर्चे के कारण किसान खेतों में ही आग लगा देते हैं ।
    ऐसे में फैलने वाले प्रदूषण और भूमि की उर्वरा शक्ति को घटने से रोकने के लिए राज्य शासन ने किसानों को सहायता की व्यवस्था की है । किसानों को यह आर्थिक सहायता खरीफ के साथ-साथ रबी फसलों के फसल अवशेषों प्रबंधन पर भी मिलेगी ।
    उप संचालक कृषि दुर्ग ने बतलाया, कि खेतों में पड़े फसल अवशेषों जैसे धान के पैरा को खेत में फैलाने के लिए 100 रूपए प्रति एकड़, डिस्क हैरो से जोताई के लिए 400 रूपए प्रति एकड़, माइक्रोआर्गेनिज्म ट्रायकोडर्मा के लिए 120 रूपए प्रति एकड़, सिंचाई के लिए 100 रूपए प्रति एकड़, कम्पोस्ट खाद के लिए 80 रूपए प्रति एकड़ और रोटावेटर चलाकर तैयार करने के लिए 200 रूपए प्रति एकड़ की सहायता दी जाएगी ।
    उन्होंने बताया कि किसानों द्वारा फसल कटने के बाद फसल अवशेषों और धान के पैरा को नहीं जलाकर उसका सुरक्षित प्रबंधन करने के काम की निगरानी और सत्यापन मोबाईल एप्प के माध्यम से किया जाएगा । इसके लिए की जाने वाली पूरी प्रक्रिया की फोटो लेकर संबंधित एप्प पर जियों टेगिंग के माध्यम से एप्प पर अपलोड की जाएंगी । इस आधार पर सत्यापन प्रमाणित होकर राशि सीधे के किसानों के बैंक खातों में जमा की जाएगी ।
    जारी किए गए निर्देशों के अनुसार इस योजना से किसानों को अधिकतम दो हेक्टेयर (5 एकड़) तक रकबे के लिए सहायता दी जाएगी । सभी जाति वर्ग के और लघु, सीमांत, बड़े किसानों को भी इस योजना का लाभ मिलेगा । रेगहा, पट्टा या लीज पर खेती करने वाले किसानों को भी इस योजना का लाभ मिलेगा । लघु-सीमांत, अनुसूचित जाति-जनजाति और महिला किसानों को प्राथमिकता के आधार पर योजना का लाभ दिया जाएगा ।
    उप संचालक कृषि ने आगे बताया कि योजना के तहत फसल अवशेषों के समुचित निपटान के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त करने किसानों को 15 दिसम्बर तक ग्राम सभाओं में अनुमोदन कराकर कृषि विभाग में पंजीयन कराना होगा। पंजीयन के समय खेती से संबंधित जरूरी दस्तावेज और बैंक खातों की जानकारी भी देनी होगी ।
    इस संबंध में कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि फसल अवशेष को जलाने से खेत की 6 इंच परत जिसमें विभिन्न प्रकार के लाभदायक सूक्ष्मजीव जैसे राइजोबियम, एजेक्टोबैक्टर, नील हरित काई के साथ ही मित्र कीट के अण्डें भी नष्ट हो जाते हैं एवं भूमि में पाये जाने वाले ह्यूमस, जिसका प्रमुख कार्य पौधों की वृद्धि पर विशेष योगदान होता है, वो भी जल कर नष्ट हो जाते हैं । जिससे आगामी फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति भी अवशेष जलाने से नष्ट होती है । फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन जैसे फसल कटाई उपरांत अवशेषों को इकट्ठा कर कम्पोस्ट गड्ढे या वर्मी कम्पोस्ट टांके में डालकर कम्पोस्ट बनाया जा सकता है अथवा खेत में ही पड़े रहने देने के बाद जीरों सीड कर फर्टिलाइजर ड्रील से बोनी कर अवशेष को सड़ने हेतु छोड़ा जा सकता है । इस प्रकार खेत में अवशेष छोडने से नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण एवं बीज के सही अंकुरण के लिए मलचिंग के काम आ जाता है ।
    नई तकनीक के जरिए, आज हार्वेस्टर से धान की फसल कटाई के बाद खेतों में फैलने वाले पैरा को इकट्ठा करना किसानों के लिए बड़ी कठिनाई का काम होता है ।
    पैरा उठाने के लिए कई बार मजदूर नहीं मिलते, कई बार खर्च अधिक लगता है, तो कई बार बारिश आदि के कारण पूरा पैरा गिला होकर पशुओं के खाने के लायक भी नहीं रहता । ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए किसान भाई, मात्र 100-150 रूपए के खर्च पर ट्रेक्टर के नागर में लोहे की जाली बांधकर पैरा इकट्ठा करने की नई तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं । कृषि विज्ञान केन्द्र दुर्ग ( छत्तीसगढ़ ) द्वारा इसी तकनीक का एजाद किया गया है ।
    इस तकनीक से आधे-पौन घण्टे में ही लगभग एक हैक्टर ( ढ़ाई एकड़ ) खेत के पैरे को इकट्ठा किया जा सकता है ।
    कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने दुर्ग जिले के किसानों को इस कम लागत वाली कारगर तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग करने की सलाह दी जाती रही है ।
    कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने बताया कि, फसल कटाई के बाद खेतों में फैलने वाले पैरे का उठाने में आने वाले परेशानियों से बचने के लिए किसान पैरे को खेत में जला देते हैं । जिससे धुआं और प्रदूषण फैलता है । साथ ही खेत की मिट्टी में रहने वाले लाभदायक माइक्रो आर्गेनिज्म तथा खाद आदि भी नष्ट हो जाती है । वैज्ञानिकों ने बताया कि इन्हीं कारणों से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने खेतों में फसल अवशेष जलाने पर रोक लगा दी है ।

    ● फसल अवशेष को इकट्ठा करने यंत्र -

    कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि छत्तीसगढ़ में धान की फसल की कटाई के बाद खेतों में फैल गए पैरे को ट्रेक्टर के नागर के पीछे लोहे की जाली लगाकर खेत में ट्रेक्टर चलाकर आसानी से कम समय में इकट्ठा किया जा सकता है । 100 से 150 रूपए कीमत की 8 फीट लम्बी तथा 1 फीट ऊंचाई वाली जाली को जमीन से 2 इंच उपर रखकर आसानी से ट्रेक्टर के नागर में तार से बांधकर ट्रेक्टर को खेत में चलाकर पूरा पैरा इकट्ठा किया जा सकता है। इस कम लागत की कारगर तकनीक का उपयोग प्रदेश के अन्य जिलों के किसान तेजी से अपना रहे हैं । कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा इस तकनीक का प्रदर्शन भी किसानों के खेतों पर किया जा रहा है ।

    - घनश्याम जी. वैष्णव बैरागी
    08827676333
    gbairagi.enews@gmail.com
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