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    भिलाई के बुद्धिजीवी वर्ग भी, नहीं कर पाये विश्लेषण कि ; भूपेश बघेल ही होंगे अगले सीएम :

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on December 18, 2018
    भिलाई के बुद्धिजीवी वर्ग भी, नहीं कर पाये विश्लेषण कि ; भूपेश बघेल ही होंगे अगले सीएम :


    छत्तीसगढ़ के तीसरे मुख्यमंत्री बने,
    "भूपेश बघेल" ;
    "चाणक्य" के "चंद्रगुप्त" भी :

    भिलाई-रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस के चंद बड़े नामों के साथ, आज एक नाम और जुड़ गया ; "भूपेश बघेल."
    जहाँ छत्तीसगढ़ के, पं. रविशंकर शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा ( मध्य प्रदेश सरकार ) और छत्तीसगढ़ गठन के साथ, अजीत जोगी के बाद भूपेश बघेल कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री बने हैं.

    छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं का राष्ट्रीय प्रभाव -

    वैसे छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्रियों के अलावा, बिसाहूदास महंत, मिनीमाता, विद्याचरण शुक्ल, चंदूलाल चन्द्राकर, महेन्द्र कर्मा, नंदकुमार पटेल के साथ ही आज, डॉ. चरण दास महंत, टी. एस. सिंहदेव, बड़े नामों में सुमार रहे है, जिसे पूरे छत्तीसगढ़ की जनता जानती और पहचानती रही है.

    यह नाम "भूपेश बघेल" अब, सबसे आगे वर्तमान में समाहित हो गया है.

    एक नजर - भूपेश बघेल :

    ◆ जन्म - 23 अगस्त 1961, दुर्ग - मध्यप्रदेश; ( अब छत्तीसगढ़ ).
    ◆ पिता - श्री नंदकुमार बघेल, माता - श्रीमती बिन्देश्वरी बघेल.
    ● पत्नी - श्रीमती मुक्तेश्वरी बघेल, ( प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी लेखक डॉ. नरेंद्र देव वर्मा की पुत्री )
    ● शिक्षा - ग्रेजुएट.

    ◆ राजनीती करियर -

    ➡️1980 में राजनीती में प्रवेश, राजनितिक गुरु - चंदूलाल चंद्राकर ( पत्रकार, दुर्ग के सांसद रहे )
    ➡️1985 - इंडियन युथ कांग्रेस में शामिल हुए.
    ➡️1990 - 1990 से 1994 तक युवा कांग्रेस दुर्ग जिला ( ग्रामीण ) के अध्यक्ष रहे.
    ➡️1994 - 1994 -1995 तक म.प्र युथ कांग्रेस के वाईस प्रेसीडेंट.
    ➡️1993 में पहली बार पाटन विधानसभा से विधायक निर्वाचित.
    ➡️1998 में दूसरी बार पुनः विधायक पाटन.
    ➡ दिग्विजय कैबिनेट में परिवाहन मंत्री, ( उस समय दुर्ग जिले से सिर्फ दो मंत्री थे )
    ➡ सन 2000 में मप्र स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कमिसन के अध्यक्ष.
    ➡️ 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने पश्च्यात, छ.ग राज्य के राजस्व, राहत कार्य व पुनर्वास तथा पीएचई विभाग के मंत्री बने.
    ➡️ 2003 में पाटन से लगातार तीसरी बार विधायक निर्वाचित, ( 2003 - 2008 तक उप नेता प्रतिपक्ष रहे है )
    ➡️ 2004 में दुर्ग लोकसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार रहे, चुनाव हारे.
    ➡ 2008 में पाटन से विधानसभा चुनाव हारे.
    ➡️ 2009 में रायपुर लोकसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार बने, चुनाव हारे.
    ➡️ 2013 और 2018 में पाटन से क्रमशः चौथी व पांचवी बार विधायक बने.
    ➡️ अक्टूबर 2014 से छ.ग कांग्रेस के अध्यक्ष का बेहतरीन कार्य रहा.
    कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की 90 में से 68 विधानसभा सीटे जीती.

    आज, 2018 में भूपेश बघेल, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं.

    कुछ ऐसी रही छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी राजनीति :

    छत्तीसगढ़ की राजनीति मध्यप्रदेश में सामिल रहते, गुटीय राजनीति नजर आती रही है.
    मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री, पं. रविशंकर शुक्ल रहे, यही कारण रहा कि, इनके दोनों पुत्र, पं. श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल का छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के राजनीति में खासा प्रभाव रहा.
    उस समय अर्जुन सिंह का राज्य और केंद्र की राजनीति में खासा दबदबा रहा. और यहीं पर, शुक्ला-सिंह का अपना-अपना प्रभाव ही आपसी गुटबाजी के रुप में दिखाई देता रहा.
    अर्जुन सिंह और पं. श्यामाचरण शुक्ल, दोनो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे 1993 चुनाव के पहले तक पं. श्यामाचरण शुक्ल नेता प्रतिपक्ष थे, जब मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार थी. लेकिन, 1993 में जब कांग्रेस पुन: सत्ता में आई, तब पं. श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री नहीं बन पाये और अर्जुन सिंह के साथ रहे दिग्विजय सिंह की ताजपोशी हो गई. इससे पहले भी मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री रहे.
    वर्ष 2000 में जब अलग छत्तीसगढ़ राज्य बना, तब विद्याचरण शुक्ल मुख्यमंत्री के लिए सबसे जाने पहचाने चेहरे माने जाते रहे थे. लेकिन, अजीत जोगी की ताजपोशी, छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में हो गई. यह भी सिंह-शुक्ल की गुटीय राजनीति के रुप में उभर कर सामने आया जिनका नेतृत्व दिग्विजय सिंह ने किया, जो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, और छत्तीसगढ़ अलग हुआ.

    छत्तीसगढ़ में तीसरे कांग्रेस प्रभाव नहीं -

    छत्तीसगढ़ में यह भी देखा गया, कि कोई तीसरा विकल्प यहाँ पसंद नहीं करता. चाहे अर्जुन सिंह का इंदिरा कांग्रेस (ति) बनाना हो, चाहे विद्याचरण शुक्ल का एनसीपी में जाना हो. आज अजीत जोगी का जनता कांग्रेस, सरकार बनाने के निकट आ भी नहीं पाई.
    यही कारण रहा कि, कल तक जो नाम मुख्यमंत्री के लिए चर्चित रहा, उसमें भूपेश बघेल सबसे आगे रहे.

    ऐसे बने "चाणक्य" के "चंद्रगुप्त" -

    दुर्ग जिले के कांग्रेसी राजनीति में कुर्मी प्रभाव रहा, जहाँ चंदूलाल चन्द्राकर और वासुदेव चन्द्राकर की जोड़ी हिट रही. चंदूलाल चन्द्राकर भले ही सांसद थे, लेकिन, वासुदेव चन्द्राकर जिन्हे, जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहते, दुर्ग जिले के राजनीति का चाणक्य कहा जाता था. जहाँ के राजनीति में चौबे परिवार ( प्रदीप चौबे-रविंद्र चौबे ) का भी खासा दबदबा था, नब्बे के दशक में यह विचार आता रहा कि, इस "चाणक्य" का "चंद्रगुप्त" कौन बनेगा.
    और इसी समय, पाटन विधानसभा क्षेत्र से पंतराम वर्मा, अनंतराम वर्मा और केजूराम वर्मा के प्रभाव वाले क्षेत्र से भूपेश बघेल को कांग्रेस टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा गया.
    जहाँ वर्मा नेता, शुक्ल-बंधुओं के खास माने जाते थे. भूपेश बघेल ने पाटन से पहली बार में ही जीत दर्ज की. पाटन विधानसभा क्षेत्र में कभी भी कोई भी विधायक बनने के बाद अजेय नहीं रहा, भूपेश बघेल ने लगातार तीन बार जीत दर्ज की.

    संघर्ष का एक और दौर था -

    1998 में पाटन से विधायक निर्वाचित होने के बाद भूपेश बघेल एक बार फिर से संघर्ष के दौर में आ गये, जब उनके ही ब्लाक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे, विजय बघेल से मनमुटाव हुआ, और 2003 में पाटन विधानसभा क्षेत्र से भूपेश बघेल कांग्रेस और विजय बघेल एनसीपी की टिकट से चुनाव लड़ते आमने-सामने रहे.
    इस समय भूपेश बघेल पाटन को जीत तो गये, लेकिन, 2008 के चुनाव में भाजपा टिकट से चुनाव मैदान में सामने रहे विजय बघेल से ही भूपेश को हार का सामना करना पड़ा.
    यह दौर भूपेश बघेल के लिए काफी कठिन था, जब, 2004 में दुर्ग लोकसभा से हारे, 2008 में पाटन विधानसभा से हारे, 2009 में रायपुर लोकसभा से हारे, पर किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि, यह भूपेश बघेल के प्रभाव बढ़ाने का काम किया जहाँ वे पद में ना रहते हुए भी दुर्ग जिले से बाहर निकले, प्रभाव बढ़ाया और पाटन विधानसभा एवं प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे.

    सक्रियता और हर किसी को पहचानने वाली छवि -

    उनके सक्रियता का ही नतीजा था जब वे विधायक नहीं रहे, राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं रही, फिर भी अपने विधानसभा क्षेत्र में सरकारी जनसमस्या निवारण शिविर में पहुंचकर क्षेत्र की जनता के समस्याओं से रू.ब.रू होने का प्रयास करते रहते, जहाँ दूसरी सरकार के प्रशासनिक अधिकारी भी उन्हे मंच देने से नहीं कतराते, भले ही कई बार इन अधिकारियों को जिला प्रशासन का कोपभाजन होना पड़ता था. लेकिन, आमजन के बीच यह एक जनप्रतिनिधि की सक्रियता देखी जाती थी.

    एक नजर में आम और खास की पहचान रखते -

    भूपेश बघेल जिस तरह से आम लोगों के बीच चर्चित रहे, एक नजर से वे लोगों के प्रभाव को भी पहचानते थे. जब 2000 में वे छत्तीसगढ़ के मंत्री थे उनके विधानसभा क्षेत्र पाटन में जनपद पंचायत भवन में सीईओ के ऑफिस में खेरथा विधानसभा क्षेत्र के विधायक प्रतिमा चन्द्राकर और गुण्डरदेही विधानसभा क्षेत्र के विधायक घनाराम साहू के साथ कुछ स्थानीय पदाधिकारियों के साथ, प्रशासनिक चर्चा करते बैठे थे एक पत्रकार अंदर प्रवेश किया, ( जिन्हे पहले वे नहीं पहचानते थे ) जिन्हे देखकर जिला युवक कांग्रेस बालोद के अध्यक्ष अभिषेक शुक्ल उठे और उस पत्रकार से हाथ मिलाये और उन्हे बैठने कहा, तभी अपने निकट बैठे दक्षिण पाटन क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य गजेंद्र सिंह ठाकुर से भूपेश बघेल ने जानना चाहा, यह कौन है ; जिला पंचायत सदस्य के बताने पर कि, ये दक्षिणपाटन-गुण्डरदेही क्षेत्र में पत्रकार हैं, तब से लेकर आज तक, भूपेश बघेल उन्हे पहचानते रहे हैं.
    चाहे कोई बार-बार मुलाकात ना भी करे उस नाम को भी पहचानते रहे हैं. यही कारण रहा कि, कई बार हमें भी उनसे मिलकर यह एहसास हुआ है. और आज भी उनके साथ जुड़े हुए लोग राजनीति में सक्रिय हैं. जहाँ उस समय के जिला युवक कांग्रेस के अध्यक्ष अभिषेक शुक्ल, आज जिला कांग्रेस कमेटी बालोद के अध्यक्ष हैं.

    संत पवन दीवान जी का मिला आशिर्वाद -

    वर्ष 2002 में गांधी विचार पदयात्रा का आयोजन पाटन में हुआ, समापन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संत पवन दीवान जी आयोजन के बाद बेहद खुश नजर आये, वे कुछ दिन बाद गुण्डरदेही विधानसभा क्षेत्र में गांधी विचार पदयात्रा समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बने, तब हमसे एक अनौपचारिक चर्चा में संत दीवान जी ने कहा, भूपेश बघेल के शान का कोई पार नहीं पा सकेगा ; एक दिन यह प्रदेश का नेतृत्व भी करेगा.

    आज यह बात
    भले ही किसी को
    अतिशयोक्ति लगे,
    लेकिन ;
    यह सच ही हो गया.।।
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