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    हिंदी का विकास लोकभाषा के साथ....

  • Amit k. Pandey 'Shashwats'
    Amit k. Pandey 'Shashwats'
    • Posted on September 15, 2017
    हिंदी का विकास लोकभाषा के साथ....
    हिंदी के बदौलत नाम, धन और यश पाने वाले आज कई लोग बड़े सम्मान से खुद को कृतिवान मानते हैं. लेकिन जिस हिंदी को लोक जीवन व् खड़ी बोली से लेकर आज वैश्विक धरातल तक ले आने में सैकड़ों हिंदी सेवी अपना सब कुर्बान किये उन्हें भूलना नहीं चाहिए. तुलसीदास , बिहारी . जायसी , मीरा , कबीर . रहीम जैसे आधारभूत रचनाकार और साहित्य परम्परा के संवाहक युगांतकारी लेखक - कवि भारतेन्दु . प्रसाद , निराला , महादेवी , प्रेमचंद आदि ने ना लोकजीवन को रचनात्मकता का आधार बनाया बल्कि यही उनके लेखकीय समृद्धि का मूल्य भी है. इस लिहाज से उनकी लेखिनी का भावार्थ लोक अर्थात जनसामान्य की सहजता से सामंजस्य रक्खे बढ़ा. अब अगर लोक भाषा के मूर्धन्य काव्यकार व् ग्रंथकार को हिंदी से विलग किया जाए तो हिंदी का इतिहास काफी सिमट जाएगा. उसी प्रकार भोजपुरी बोलने वाले प्रवासी भारतीयों ( जो अंग्रेजी अधिपत्य में विभिन्न टापू देश :मारीशश ,फिजी , गुयाना आदि देशों में ले जाए गए, और अब वहा आजाद तथा जीवंत हिंदुस्तान हैं )के क्षेत्रगत संख्या व् प्रसार को ही हिंदी के वैश्विक स्वरूप के लिए मूलतः आधार लिया गया . मतलब यहां भी भोजपुरी जैसी सशक्त लोक भाषा को ही निगला गया . लेकिन लोक भाषा - भाषियों की फौलादी इक्षाशक्ति व् त्याग ने कोई विरोध के बजाये देश की एकता और अखंडता को सर्वोपरि मान के सहन किया. लेकिन आज हिंदी की कमाई व् लाभ लेने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी हींलोक भाषाभाषी को हिंदी के राह में रोड़ा बता के अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं. निश्चित रूप से लोक भाषा के प्रति दुराग्रह हटाने में सरकार को पहल करनी होगी . इसके लिए भोजपुरी जैसी आधारभूत अंतराष्ट्रीय स्वरूप की भाषा को अब विभिन्न संवैधानिक प्रारूप में मान्यता देनी चाहिए . इससे हिंदी का भी विकास होगा , साख मजबूत होगी , सहयोग की ठोस गुंजाइश बनेगी साथ ही हिंदी के सर पर सवार हो रही अंग्रेजी को थामना भी संभव हो सकेगा. समय रहते ऐसा होना हिंदी क्षेत्रों का वास्तविक व् व्यापक विकास करने की भूमिका साबित hogaa .
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