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    वक्त जरूरत पर बने संवेदनशील रिश्ते

  • Vyomesh Chitravansh
    Vyomesh Chitravansh
    • Posted on April 26
    वक्त जरूरत पर बने संवेदनशील रिश्ते
    वक्ती जरूरत पर बने रिश्ते और वक्त की लिहाजी जरूरतें :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 अप्रैव 2018.
      
                रिश्तों का कोई नाम नही होता , क्योंकि किश्ते दिमाग से नही दिल से जुड़े होते हैं . कभी कभी वक्त की जरूरत से बने यह रिश्ते उन सभी मानवीय संवेदनाओं पर भारी पड़ते है जो एक पढ़ा लिखा व्यक्ति जीवन के उतार चढ़ाव के सारे आकलन कर के भी नही मूल्यांकित कर पाता. इन वक्ती रिश्तो को देख कर कभी कभी सुविधाओं की जरूरत भी खड़ी होती है  पर वो वक्ती जरूरत पूरी होने के साथ ही हम उन रिश्तों को भी भूल जाते है और जरूरत वाली सुविधा की मॉग को भी. इसे संवेदनहीनता कहें या व्यस्तता वश भूल या  खुद को समेटे रहने वाला मानव व्यवहार, आप खुद नाम दिजीये. कल सायं बीएचयू अस्पताल जाना हुआ.

          नहीं पता, उसका नाम गुलाबों था गुलबिया या कुछ और। चित्कार की आवाज से ऐसा लगा कि उसका नाम इसी से मिलता-जुलता होगा। उसके पास बैठी महिला बार-बार दहाड़े मार उस पर गिर जाती फिर उठती। बीच-बीच में आवाज आती 'अरे,करेजऊ कहां चल गईलू'। थोड़ी ही देर बाद एक नौजवान आता दिखता है। उसके पीछे चल रहे दूसरे युवक के हाथों में अंतिम संस्कार का सामान था।
    महिला युवक को देखती है तो और दहाड़े मार रोने लगती है। युवक उसे किसी तरह सम्भालने की कोशिश करता, इससे पहले वह महिला जमीन पर लेटी युवती पर गिरकर बेहोश हो जाती है।
    यह दृश्य आस-पास खड़े दर्जनों लोग देख रहे थे। फिर वहां दो-तीन महिलाएं पहुंचती है।बेहोश महिला को कुछ देर के अथक प्रयास के बाद होश में लाती है। युवक का साथी घड़े में पानी लाता है। सड़क के किनारे बने पाथ-वे पर तीन महिलाएं साड़ी से पर्दा करती हैं।बार-बार बेहोश हो रही महिला को एक अन्य महिला सहारा देकर अंदर ले जाती है। फिर दोनों युवक सड़क पर लेटी महिला को अंदर ले जाते हैं।
    दो दिन पहले हम भी बीएचयू के सर सुंदर लाल चिकित्सालय के बाहर तमाशबीन बन गये थे। महिला की चित्कार ने मेरे कदम रोक दिए। समझने की कोशिश करने लगा कि माजरा क्या है। दूसरे मरीजों के परिजनों ने बताया कि बहुत कम उम्र की युवती का देहांत हो गया। रो रही महिला उसकी मां या सास है। दो युवकों में एक संभवतः पति और दूसरा भाई है। सड़क किनारे साड़ी से पर्दा कर अंतिम विदाई के लिए तैयार करने वाली महिलाएं दूसरे मरीजों के साथ आयीं थी। हम अभी इस मानवीय रिश्तों को क्या नाम दें सोच रहें थे,तब तक यह सवाल उठने लगा कि इतने बड़े अस्पताल में कोई शव स्नान घर क्यों नहीं? क्या किसी बड़े अस्पताल के निर्माण के दौरान प्लानिंग का ये हिस्सा नहीं होना चाहिए वह भी काशी नगरी में?कारण मोक्ष की नगरी तो कहा ही जाता है ।साथ ही यह भी तो है सिर्फ पूर्वांचल नहीं बल्कि नेपाल, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों के मरीज यहां इलाज को आते हैं।उनके लिए तो यही एम्स होता है। फिर जब कोई मरीज दम तोड़ देता है तो हर परिजन की इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि वह पार्थिव शरीर घर ले जा सके।ऐसे में वह जिस भी धर्म को मानने वाला हो यहीं अंतिम संस्कार का फैसला कर लेता है।
    कुछ ऐसा ही इस महिला के साथ हुआ होगा।ऐसा अंदाज लगा। चिलचिलाती धूप में करीब एक घंटे तक साड़ी से शव को घेरे महिलाएं खड़ी थीं। फिर साथ का एक युवक जाता है, टैम्पों लेकर आता। फिर शुरू होती है अंतिम यात्रा।
    टैम्पों के जाने और पसीना पोछ बेहाल दिख रही महिलाओं के चेहरे का भाव पढ़ने की हम कोशिश करते रहें। जिससे इस रिश्ते का नाम तय कर सकूं। पर हो न सका। फिर हम यही सोचते -सोचते  कब चौथे मंजिल पर पहुंच गये पता ही नही चला.....
    (बनारस, 21 अप्रैल,2018, शनिवार)
    http://chitravansh.blogspot.com

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