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    मेरे पत्र का रजत जयंती ।। संस्मरणात्मक - कहानी ।।

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on December 5, 2017
    मेरे पत्र का रजत जयंती ।। संस्मरणात्मक - कहानी ।।

    ☆ मेरे वो 111 रुपए ☆
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    { अतीत के चलचित्र }
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    फिर से चुनाव का दौर चल पड़ा है, गुजरात की राजनीति चरम पर है ; समाचार देखते हुए अचानक, एक 25 वर्ष पुरानी बात याद आ गई ! मैने अपने धर्मपत्नी से पूछा ? याद है 1992, उस समय 111 रूपए का मूल्य क्या रहा होगा ! उन्होंने मेरे तरफ देखते हुए कहा - बहुत बड़ा मूल्य था ; मैं उस समय आठवीं कक्षा में पढा़ई कर रही थी । मैने यहाँ तक ही उनके बातें सुनी !!
    फिर पूरा मंजर उस दिन का याद आया जब, मेरे हाथ में 111 रुपए का बाउचर पत्र था, और मुझे रायपुर स्थित आकाशवाणी केंद्र में प्रश्न-मंच कार्यक्रम में भाग लेने जाना था ।
    यह मेरे जीवन का ऐसा पहला पत्र था जहाँ मुझे आमंत्रित करते हुए, पत्र के साथ 111 रूपए का बाउचर भी मिला था । लेकिन, उस समय देश के हालात कुछ ऐसे थे कि, एक मध्यमवर्गीय परिवार के सिर्फ 21 वर्षीय, सबसे बड़े लड़के को इन हालातों में गांव से 70 किमी दूर अघोषित राजधानी जैसे शहर में कैसे भेज दे ? उस समय छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं बना था लेकिन, रायपुर को बुद्धिजीवी वर्ग राजधानी के नाम से ही संबोधित करते थे ! तो मैं भी यही सोचता था । फिर सारी बातें मन को कौंध रही थी ? कि, पिताजी से रायपुर जाने की इजाजत कैसे मांगू ? या बगैर बताए भी तो नहीं जा सकता था । खैर पिताजी एक शासकीय कर्मचारी थे, तो उनको सारे हालातों में काम करना आता था । यही बात, वह हमको भी सिखाते थे । पर मां तो ममतामयी थी, वो कैसे इन हालातों में आज, जाने की इजाजत देंगे ? लेकिन, ऐसा क्या था उस दिन में !
    दिन रविवार, 06 दिसम्बर 1992 ; शुबह के 09 बजे थे, और 09 किमी दूर साईकिल से जाकर बस बैठकर, फिर रायपुर पहुँचना है । क्योंकि, 01 बजे तक युववाणी के प्रश्न-मंच के रिकार्डिंग के लिए, पहुँचने हैं । फिर तो तुरंत इजाजत लेनी थी । अब आप समझ गये होंगे कि, मुझे सौ प्रतिशत इजाजत नहीं मिली होगी ! क्योंकि, पिताजी ने कहा - बस, संभल के जाना । इसलिए नहीं कि, पैसे मिलेंगे ? इसीलिए कि, यह तुम्हारा पहला काम है । पर मां का आदेश ? नहीं !! क्योंकि, उस दिन देश के हालात, रायपुर से 1000 किमी से भी दूर अयोध्या में बिगड़े थे ! कि, पता नहीं शाम तक क्या होगा ? लेकिन, उनका दंश यहाँ तक था ! क्योंकि, मां-बाप तो सोचेंगे ही ।
    आज भी वह पत्र मेरे पास रखी हूई है ! सोचता हूँ ; यदि, उस कार्यक्रम में मैं जाता तो, क्या मैं किसी अच्छे कार्यक्रम में होता ? यह सिर्फ सोचने के लिए ही रह गया । क्योंकि, लगातार 11 माह तक मैं उस कार्यक्रम में शामिल हुआ था । वहीं पिछले महिने ही, युववाणी के कार्यक्रम को लेकर कार्यक्रम संपादक द्वारा मेरे 03 मिनट का इंटरव्यू भी लिया गया था ; और आज यह आमंत्रण, बाउचर के साथ पहली बार मिला । और बगैर भुनाए, शायद आखरी भी ! लेकिन, आज भी वह पत्र मेरे काम आता है, जब मैं अपने बच्चों को दिखाता हूँ ; कि, यह मेरा पहला कार्यक्रम का पत्र । इस पत्र को देखकर, अचानक मेरी छोटी बेटी, जो बी.एस.पी. कक्षा में पढा़ई कर रही है ने कहा - "पापा यह तो अतीत के चलचित्र है" और मुझे अनायास इस समय , लिखने की प्रेरणा मिली गई ।
    और भी यह पत्र, जब कोई मुझे पूछता है कि, 25 साल से काम कर रहे हो, कुछ मिलता है ; तब उस पत्र को मैं उन महाशयों को दिखाता हूँ ; ( क्योंकि, यह मुझे प्राप्त हुए, मेरे उन चंद महत्वपूर्ण पत्रों में सामिल हो गया है ! ) उस समय मेरे चेहरे पर अजीब सी ताजगी होती है !! पर... ???
    "आज भी
    याद आता है वह मंजर
    कि,
    कैसे हालात थे ।
    दहशत वहां तो थी
    जिसकी,
    गुंज तो हमने यहीं सुनी ।।
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    - घनश्याम जी.बैरागी
    08827676333
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