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    ठंड की नायिका :

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on January 29, 2018
    ठंड की नायिका :

    @ बूँदें ओस की @
    **************** .
    कैसी है
    यह,
    बूँदें ओस की !
    जैसे,
    मोतियों की माला
    टूटकर ;
    बिखरी पड़ी
    इधर-उधर ।।
    धरातल की
    इस,
    हरियाली
    बिछौने पर ।
    शोभायमान है
    यह,
    बूँदेें ओस की ।।
    जैसे,
    नई-नवेली
    दुल्हन सी सजी ।
    इन,
    हरियाली
    पंखुड़ियों को ;
    यदि,
    छू लें तो
    हो जाती है
    पानी-पानी !
    यह,
    बूँदें ओस की ।।
    जैसे,
    रात की पुरवाई में
    न,
    कालीघटा का जोर ।
    न,
    झड़ी का शोर !
    फिर भी
    बिजली की कौंध से,
    चमचमाती हुई
    छनकती ;
    यह,
    बूँदें ओस की ।।
    जैसे,
    रात के सन्नाटे में
    कोयल सी कुहूक ।
    ठंड की ठिठुरन में,
    कोहरे की
    दुशाला ओढ़े ;
    मन को लुभाती !
    यह,
    बूँदें ओस की ।।
    जैसे,
    गरीबी की
    जकड़न में,
    कवि की
    कल्पना से साकार ।
    हरियाली धरती पर
    बिछौने के आसपास !
    कहीं,
    गुलाब की
    पंखुड़ियों में ।
    जैसे,
    मोतियों का गुच्छा ।।
    खुद को हर्षाति
    मन को लुभाती,
    गरीबी को भुलाती !!
    यह ;
    बूँदें ओस की ।।
    ***********************
    - घनश्याम जी.वैष्णव बैरागी
    08827676333
    - नंदिनी-भिलाईनगर ( छ. ग. )
    gbairagi.enews@gmail.com
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