Participating partners:


    ओस की बूँद ।।

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on November 7, 2017
    ओस की बूँद ।।

    ☆ ओस की बूंद ☆
    ~~~~~~~~~
    कैसी है
    यह,
    ओस की बूंद ।
    जैसे,
    मोतियों की माला
    टूटकर,
    बिखरी पड़ी
    इधर-उधर ;
    धरातल की
    इस,
    हरियाली बिछौने पर
    शोभायमान है
    यह,
    ओस की बूंद ।
    जैसे,
    नई-नवेली
    दुल्हन सी सजी
    इस,
    हरियाली पंखुड़ियों को
    यदि, छू लें ;
    हो जाती है
    पानी-पानी
    यह,
    ओस की बूंद ।
    जैसे,
    रात्रि की पुरवाई में
    न, कालीघटा का जोर
    न, झड़ी का शोर
    फिर भी ;
    बिजली की कौंध से
    चमचमाती हुई छनकती
    यह,
    ओस की बूंद ।
    जैसे,
    रात के सन्नाटे में
    कोयल सी कुहूक,
    ठंड की ठिठुरन में
    कोहरे की
    दुशाला ओढ़े,
    मन को लुभाती
    यह,
    ओस की बूंद ।
    जैसे,
    गरीबी की
    जकड़न में,
    कवि की कल्पना से
    साकार ;
    हरियाली धरती पर
    बिछौने के आसपास
    जैसे,
    मोतियों का गुच्छा !
    खुद को हर्षाति ,
    गरीबी को भुलाती
    यह ;
    ओस की बूंद ।।
    ----------------------
    - घनश्याम जी.वैष्णव बैरागी
    नंदिनी-भिलाईनगर (छ.ग.)
    08827676333
    ======================
    1 People like this
    Post Comments Now
    Comments