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    एक - कहानी :

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on November 22, 2017
    एक - कहानी :
    ☆ एक डॉक्टर की मौत ☆
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    आज एक बार फिर से अपने कैबीन में बैठकर पचास साल पहले की घटना याद करते सहम सा गया, डॉ. विनोद ।
    एक बड़ा सा क्लीनिक, चार सहायक, प्रशिक्षु डॉक्टर, छ: कम्पाउंडर, अन्य कर्मचारी, दिनभर में आते-जाते सैकड़ो लोग, डॉ. विनोद को नमस्कार करने नहीं भूलते । कई लोग जो मरीज बनकर आते रहे, आज स्वस्थ हो गये डॉ. विनोद के पैर छूने नहीं भूलते । डॉ. विनोद, लोगों को कई बार समझा गये कि, इस तरह से पैर मत छुआ करें , मैं कोई भगवान् नहीं ? पर वे लोग यही कहते, आप भगवान् ही तो हैं डॉक्टर साहब, मरते लोगों को जिंदगी दिला देते हैं !
    डॉ. विनोद इस बात पर फिर सोचने लगते, क्या डॉक्टर भी किसी के मृत्यु का कारण बन सकता है ! आखिर फिर से पचास साल पहले की बात पुन: याद आ गई । क्या हुआ था पचास साल पहले ?
    बात उस समय की है, जब विनोद कुमार, डॉक्टरी का सर्टिफिकेट और कुछ अनुभव लेकर गांव खेलपुर में आया था । उस समय इस गांव में कोई डॉक्टर नहीं था । छ: हजार की आबादी वाले इस बड़े से गांव में आज से पचास साल पहले लोग वैद्यराजों से ही इलाज कराया करते थे । डॉ. विनोद एक छोटे से घर में, एक कमरे में अपनी डिस्पेंसरी लगाई , बाहर दीवाल पर लिख दिया, डॉ. विनोद का दवाखाना । और दूसरे कमरे में पत्नी, तीन साल के बेटे और एक साल की छोटी बेटी के साथ रहने लगे ।
    डॉ. विनोद के आने से गांव के लोग तो खुश थे लेकिन, वैद्यराजों को तकलीफ होने लगी थी क्योंकि, कहीं न कहीं डॉक्टर के सामने वैद्य का इलाज देर से असर करता ? तो लोग डॉ. विनोद के दवाखाना की राह पकड़ने लगे । और विनोद की डॉक्टरी शुरू हो गई । गाँव के मुखिया और बड़े पूंजीपति लोगों के साथ भी डॉ. विनोद के अच्छे संबंध बनने लगे क्योंकि, प्रत्येक छोटे-बड़े घरों में डॉ. विनोद, घर पहुंच सेवा दे, उनके घरों में जाकर ईलाज करते थे । और गांव में डॉ. विनोद की प्रसिद्धी बढ़ने लगी । इसी बीच तीन महीने बीते एक रात, एक ऐसी घटना घटी जो डॉ. विनोद के जीवन का राह ही मोड़ दिया । डॉ. विनोद के द्वारा ईलाज के दौरान गांव के एक व्यक्ति भोंदू कटरा की मौत हो गई ।
    सिर्फ तीन महीने का मेहनत, गांव में बढ़ती इज्ज़त, नई घरवाली, छोटे-छोटे दो बच्चे ? प्रश्न डॉ. विनोद के सामने खड़ा हो गया ; अब क्या होगा ? गांव में ही मजदूरी करने वाला भोंदू ,साठ साल की उमर, नशे की आदत, थक सा गया था । डॉ. विनोद इनके ईलाज कर रहे थे । पर भोंदू के नशा और पीने की आदत कम नहीं हुई । मौत तो उनकी तय थी, लेकिन इस तरह ? और यहाँ !
    भोंदू के परिवार में उनके एक पन्द्रह साल का नाती, जो इनकी इकलौती बेटी का बेटा था, साथ रहता था। भोंदू के पत्नी और बेटी की मौत दो साल पहले ही हो चुकी थी । जबकि, इनकी बेटी को इनके दामांद ने दस साल पहले ही छोड़ दिया था । तो वह अपने बच्चे के साथ अपने मां-बाप, भोंदू के घर रहने आ गई ।
    भोंदू कटरा की अचानक मौत, डॉ. विनोद को मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया । रात के लगभग साढ़े बारह बजे, भोंदू की हालत बिगड़ने पर उनके नाती ने इनको, डॉ. विनोद के दवाखाना लेकर आया था । घटना के बीस मिनट तक डॉ. विनोद, भोंदू के मृत शरीर के पास बैठे रहा । एक हिम्मत का एहसास करते, डॉ. विनोद, भोंदू के शरीर को वहीं रखे एक कपड़े से ढंक कर बाहर निकल कर दरवाजे बंद कर दिया । बाहर बैठे उनके नाती को यह कहकर कि, भोंदू अब ठीक है और आराम कर रहा तुम जाओ अपने घर, सुबह आना । और उसे घर भेज दिया । डॉ. विनोद, अपने घरवाली को भी बगैर कुछ बताए यह कह कर कि, मुखिया के घर का बुलावा है मैं जल्द ही आ रहा हूँ । और अपने सायकल से मुखिया के घर की ओर चल दिया ।
    मुखिया के घर में गांव के तीन बड़े लोग पहले ही मौजूद थे, गांव की कुछ समस्यों के समाधान पर विचार मंथन चल रहा था । अचानक, डॉ. विनोद को देखते सब चौके ; रात के पौने एक बजे.... क्या कारण कि...
    अचानक, मुखिया बोले - डॉक्टर साहब, आप ! इस समय ? क्या घर से किसी ने बुलावा भेजा था ?
    डॉ. विनोद, गांव में सिर्फ अपने काम से मतलब रखते थे । कहीं पर भी बैठक करने की इनकी आदत नहीं थी । तो, मुखिया का इस तरह से चौकना, जाहिर था । घर से भी डॉक्टर बुलाने किसी नौकर को नहीं भेजा गया । चारों नौकर , मुखिया के आसपास ही मौजूद थे ।
    डॉ. विनोद - कुछ सहमे से बोले - कुछ बात करने थे मुखिया जी ?
    मुखिया बोले- हां-हां बिल्कुल , बोलो... ये... लल्लन, रामप्रसाद, और बलवंत सब अपने ही लोग हैं ।
    इधर डॉ. विनोद ने जब अपनी पूरी बात सुनाई । मुखिया सहित सब के होश उड़ गए ।
    डॉ. विनोद के काम और सेवा भावना ने सबको प्रभावित किया था । जाहिर है मुखिया और गांव के बड़े लोग भी प्रभावित थे ।
    मुखिया ने पूछा - अभी कहां रखे हो भोंदू को....
    डॉ. विनोद बोले - बस मुखिया जी, मेरे दवाखाने में ही है । हाथ जोड़ते हुए... डॉ. विनोद पुन: बोले- एक बार मुझे इस मुसीबत से बचा लीजिए मुखिया जी, नहीं तो मेरा परिवार बिखर जाएगा ।
    मुखिया अपने बैठक से उठा , डॉ. विनोद की तरफ बढ़े, नजदीक पहुंचकर, उनको अपने दोनो हाथों से पकड़कर कुर्सी से उठाया, लम्बी साँसें ली ; और बोला- फिक्र मत करो डॉक्टर साहब, हम हैं ना ।
    क्लीनिक पर आज के दिन अचानक, एक बुजुर्ग महिला को अपने पैर छूते देख, डॉ. विनोद का ध्यान टूटा ; वह चौक गया !
    नहीं माई... आप बुजुर्ग हैं, मैं आपके बेटे समान हूँ ; मेरे पैर मत छूएं ... बुजुर्ग महिला डबडबाई आंखो से , कंपकपाती हुई अपने दोनों हाथों को आपस में जोड़ते हुए कहा- आपने मेरी बुढ़ापे की लाठी, मेरे पोते को जिंदगी दी है डॉक्टर साहब ।
    इस बुजुर्ग महिला के पैंतीस साल के पोते का ईलाज, डॉ. विनोद ने लगभग कम फीस लेकर ही पूरा किया था, जो आज पूरी तरह से स्वस्थ हो चुका है ।
    उस बुजुर्ग महिला के जाने के बाद अपने स्प्रिंग की कुर्सी में बैठकर, 'बीस-बाई-बीस' के ए.सी. कमरे में डॉ. विनोद, उस पचास साल पहले बीती बात को पुन: याद करते सोचता है, क्या आज मैंने एक बुजुर्ग को सहारा दिया ! या पचास साल पहले एक मरीज की मौत से , उस समय पन्द्रह साल के एक बच्चे का सहारा छिन लिया था ?
    डॉक्टर विनोद सोचता है कि, उस दिन एक मरीज मर गया ? या हो गई एक डॉक्टर की मौत ! ।।
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    - घनश्याम जी.वैष्णव बैरागी
    08827676333
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