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    एक - कहानी ।। वो दस दिन ।।

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on November 8, 2017
    एक - कहानी ।। वो दस दिन ।।

    शरद जैसे ही दुकानदार से पाव-भाजी का पैकेट लेकर अपने दस साल की गुड़िया की तरफ पलटा, नजर अचानक सामने टिक गई ।
    अचानक गुड़िया बोली - देना पापा... जैसे ही गुड़िया की बोली शरद के कानों में गुंजी, नजर हटी ; सामने खड़ी महिला से... !
    शरद - आप यहाँ ... कैसे ?
    सामने से प्रेमा बोली - मैं यहीं, पास में ही तरंग अपार्टमेंट में रहती हूँ ।
    वही सुरीली आवाज धीरे से बोल, कितना मधुर संयोग है आज का !
    बच्ची की तरफ इशारा करते हुए शरद जैसे ही बोलना चाहा, प्रेमा नीचे झुक कर मुस्कुराते हुए गुड़िया के गाल को प्यार से सहलाते हुए, शरद की तरफ देखते हुए बोली- बड़ी प्यारी गुड़िया है । कितने बच्चे हैं ...?
    शरद थोड़ी देर चुप रहा... फिर बोला - एक ।
    मां क्या कर रही है बेटा... प्रेमा, गुड़िया को संबोधित करते हुए पूछा ।
    गुड़िया - मां तो हमारे पास नहीं रहती ।
    प्रेमा - फिर कहां गई है मां ?
    गुड़िया - मां भगवान् के घर चली गई है ।
    गुड़िया की बात, प्रेमा को अचरज में डाल दिया ! बगैर कुछ बोले, शरद की तरफ देखती रही प्रेमा ? शरद के चेहरे में शायद, अफसोस झलक रही थी !
    प्रेमा बोली - यहीं थोड़ी दूर ही मेरा अपार्टमेंट है ; चलेंगे । आज शरद , प्रेमा को मना नहीं कर पाया ! शायद कल भी मना नहीं करते, तो... कहीं इस घड़ी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती ।
    प्रेमा के दो कमरे वाली सजी-धजी फ्लैट पहुंचे ; शरद - बैठते ही पूछा - और बाकी सब कहां हैं ?
    प्रेमा मुस्कराते हुए - बस, दो कमरे ,किचन, वासरूम... ( लम्बी आहें भरते हुए ) कुछ सामान ; कुछ तन्हाइयों के साथ... बचा-खुचा आधा जीवन... ?
    शरद यह देखकर भौंचक रह गया !
    दस साल पहले, शरद और प्रेमा कॉलेज के समय में एक साथ पढ़ते थे, परिवार के संबंध भी एक जैसा था पर ; दोनो एक नहीं हो सके ।
    प्रेमा, अपने मां-बाप की इकलौती बेटी थी । शरद को, अपने मां-बाप की इकलौती लड़की को जीवन साथी बनाना पसंद नहीं था ! कि, कहीं मैं भी घर-जमाई न, बन जाऊँ ? शरद अपने पिता के दर्द को महसूस किया था । शरद की मां भी, उनके नाना-नानी की इकलौती संतान थी । परंतु शरद द्वारा प्रेमा से विवाह नहीं करने के कारण को शरद के पिता नहीं समझ पाये थे । और जब समझे , तो काफी देर हो चुका था ।
    उन्होंने शरद को समझाने का बहुत प्रयास किया कि, सब संबंध एक जैसे नहीं होते । शायद, शरद का बचपन नानाजी के घर बीतते, पिता के प्यार के लिए तरसा था । और शरद के पिता भी उनके लिए उतने ही बेचैन दिखाई देते थे ।
    प्रेमा, शरद के अच्छे व्यवहार और स्वभाव की वजह से उन्हे पसंद करती थी । वहीं शरद के माता-पिता भी प्रेमा को पसंद करते थे । प्रेमा , अपने पिताजी को शरद के घर रिश्ते के लिए भेजी थी ; पर शायद यह संबंध होने ही नहीं थे ।
    आज प्रेमा ने बताया, कि, वे विवाह के छ: महीने बाद ही अपने पति से अलग हो गए, फिर पिछले आठ वर्षों से एक प्राइवेट कंपनी में एकाउंटेंट के पद पर कार्य कर रही है । वहीं शरद, एक अन्य कंपनी में लिगल-एडवाइजर है । विवाह के दो वर्ष बाद, एक बच्ची छोड़कर पत्नी गुजर गई । और आज इस मोड़ पर ?
    कुछ देर बैठने के बाद अचानक, शरद बोला - अब चलना चाहिए "प्रेम" !
    वर्षों बाद फिर से वही नाम संबोधन सुनकर प्रेमा, शरद की ओर देखती रह गई ! पर शायद, शरद को रोकने की हिम्मत आज भी नहीं जुटा पाई ।
    अपने घर जाते हुए आज शरद को "वो दस दिन" याद आये जब कॉलेज के अंतिम वर्ष, परीक्षा के दिन ; जिन लम्हों को शायद प्रेमा, पिछले दस वर्षों से याद करती रहीं ?
    पढ़ाई का अंतिम वर्ष, और परीक्षा के अंतिम दस दिन ; प्रेमा, आते और जाते अपने सहेलियों से नजर चुराकर, शरद को एक नजर देख , गुजारती रही ।
    शरद चाहकर भी प्रेमा की तरफ नहीं देखता । और अपने मित्रों के बीच व्यस्त दिखाई देते कॉलेज से घर की ओर चल देता । क्योंकि, अभी परीक्षा शुरू होने के दो दिन पहले ही प्रेमा के पिता, दोनो के विवाह का प्रस्ताव लेकर आये थे । ताकि, परीक्षा होते ही दोनों का विवाह हो जाये । और दोनों परिवार की सहमति भी थी । सिर्फ, शरद ने परीक्षा का बहाना बनाकर टाल दिया था ।
    शायद, कहीं एक-नजर, उस प्यार के एहसास को जगा न दे ; जब पहली बार प्रेमा को देखकर शरद के दिल में भी जगा था !
    लेकिन, तब कहां पता था, वह बड़े घर की इकलौती लड़की है ।।
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    - घनश्याम जी. बैरागी
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    - घनश्याम जी. बैरागी
    नंदिनीनगर भिलाई
    ( छत्तीसगढ़ ) - 490036
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