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    मुहब्बत की मंजिल

  • Amit k. Pandey 'Shashwat'
    Amit k. Pandey 'Shashwat'
    • Posted on October 8
    मुहब्बत की मंजिल
    उठ आये गर मुहब्बत लहर गयी समझों शहर औ बसर , दुनियादारी लगे है कहर हो भी जाय बादशाही बेअसर . ना अपना ठिकाना मिले है ना मुहब्बत का पता , हजार कोस चलते रहे तो भी, जहां से चले ,
    मुहब्बत की उतनी ही डगर.
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