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    धूप की परछांई :

  • Ghanshyam Bairagi
    Ghanshyam Bairagi
    • Posted on January 5
    धूप की परछांई :

    देख ;
    वो निकला धूप,
    बन गई परछांई ।
    जैसा चेहरा आपका
    वैसे ही बनी परछांई ।।
    धूप,
    जीवन का सच है ।
    सच कभी छिपता नहीं ।।
    छांव की ओट में,
    कुछ भी दिखता नहीं ।
    चित्र तो
    बदल सकता है ।
    नहीं बदलती परछांई ।।
    चित्र ;
    मिट सकता है कभी ।
    मिटती नहीं कभी परछांई ।।
    धूप से बचने हों तो,
    छांव तो मिल जाती है ।
    छांव की ठंडक अधिक,
    तब मिलती नहीं धूप भी ।
    धूप की ओट में,
    दिखती है जब परछांई ।।
    जीवन का सत्य है ।
    यह ;
    धूप की परछांई ।।

    - घनश्याम जी बैरागी
    08827676333
    gbairagi.enews@gmail.com
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