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    राजनितिक अस्पृश्यता - राष्ट्रवादी बनाम राजनितिक दलित

  • Vishnu Mohan
    Vishnu Mohan
    • Posted on June 23
    राजनितिक अस्पृश्यता - राष्ट्रवादी बनाम राजनितिक दलित
    दोनों मोर्चो को राष्ट्रपति चुनाव में इस नयी पार्टी की अनदेखी ठीक नहीं हैं. कुछ भी हो 100 विधायकों की इस पार्टी से इतना दुराव ठीक नहीं. वक्त बदलते देर नहीं लगती ये बात तो दोनों पार्टी को पता हैं. पर कुछ भी हो एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि अरविन्द केजरीवाल जी एक ऐसी शख्सियत बन कर उभरे है जिनसे इन दोनों दलों की राजनीती को काफी असर पड़ा है. चाहे वो कैसे भी हो पर इन लोगो के मन में एक भय बैठने में आप पार्टी और वो सफल रहे है.अब तक की मजे वाली राजनीती जिनमे नेता लोग राय बहादुर जैसी जिंदगी जीने के आदि हो गए थे अब वो जमीन पर चल रहे हैं. आज से पहले इनको मतदाताओं को लेकर इतनी अनिश्चितता नहीं थी. पंजाब में आप की एंट्री को कम आंकना जल्दबाजी होगी. लालू जैसे लोग घोटाला और आपराधिक गलबहियों के बाद भी जब बिहार में पैठ बना सकते हैं तो केजरीवाल इनसे काफी बेहतर हैं अभी तक इनपे इस प्रकार का कोई आरोप सिद्ध नहीं हो पाया हैं. भाषा और तौर तरीके में ममता से तो बेहतर ही हैं. बयान बाजी में ममता और मणिकांत अय्यर ने भी हदे पर कर रखी थी और करते हैं. केजरीवाल जी भी इनके बाई प्रोडक्ट हैं. उन्होंने उन लोगो को साथ लिया जिनका तथाकथित दो पार्टियों के रायबहादुर लोगो ने पिछले ६० सालो से धार्मिक सामाजिक और आर्थिक शोषण ही किया बाकि कोई भी ऐसा काम नहीं किया जो बेहतर प्रबंधन और परिणाम का नमूना बन सके. विकास हुआ पर विकास किन शर्तो और मूल्यों पर किया ये भी सोचने की बात हैं. सैफई जैसा विकास करने वाले समाजवादी कैसे हो गए ? कोई चरवाहा स्कूल खोलता हैं और जब बिचारे चरवाहे पढ़ रहे होते हैं तो पीछे से चारा ही खा जाता हैं. उत्तर प्रदेश बिहार बंगाल , नार्थ ईस्ट, उत्तराखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र कितने नाम लिए जाये कही भी ये लोग खड़े हो कर बता दे कि ६० सालो का काम क्या होता हैं. रही कानून व्यवस्था और आम नागरिक की हालत तो गरीब और अंतिम आदमी छोटे से आरोप पे ही आज भी थाने में जमीन पर बैठा मिलता हैं तो कलमाड़ी और लालू जैसे लोग सुविधा के हिसाब से जाते हैं और ४-५ घंटे AC रूम में मालिक की तरह सवाल जवाब करते हैं. अपराधियों में ये फर्क क्यों ? क्या रसूख ही तय करता था इंसान के मुद्दों और समस्याओ को. जनहित तो सिर्फ नारा ही रह गया था. जब बंगाल में नक्सल वाद के नाम पर कत्ले आम हो रहा था तब भी तो जनतंत्र ही था ? बांग्लादेशी समस्या क्या खुद चल के आयी ? कई ऐसे पहलु हैं जिनमे ये दोनों दल एक बड़े अपराधी की भूमिका में नजर आते हैं . एक ही देश में अलग अलग तरीके का कानून लोगो को व्यथित करता हैं. आम जरूरतों से ऊपर आज भी लोगो को जाने नहीं दिया गया. सड़क पानी बिजली से ही चुनाव लड़े जाते रहे तो भी ठीक था पर जाती के नाम पर चल रही बंदरबाट के बाद इन चीज़ो को रखा और समझा गया ये भी बात इनको असफल जनतांत्रिक सरकार का तमगा देती हैं. कागजो पर कई योजनाए दिखाई गयी अरु लोगो ने वोट दिए. बस ! दिल्ली का वज़ीराबाद पुल इस प्रकार के शासन की झलक हैं 400 करोड़ के बजट से शुरू होकर 1600 करोड़ तक पहुंच गया पर अभी भी अधूरा है. देश की राजधानी है फिर भी गन्दगी और अव्यवस्था हर जगह है. ऐसे माहौल में केजरीवाल जी ने अन्ना के साथ आंदोलन शुरू किया और पुरे देश का ध्यान अपनी तरफ कर लिया. चोर बाजारी, रानीतिक अपराध, देश के संसाधनों की लूट और बंदरबाट देखती जनता अब ऊब चुकी थी राम मंदिर और हिन्दू मुस्लिम दलित पिछड़ा आरक्षण सब्सिडी जैसे मुद्दों से चुनाव अब विकास पर आ गया. सरकारी अम्लों के भ्रस्टाचार के खिलाफ लोकपाल लोगो के मन में बैठ चूका था. छोटी से छोटी सुविधा में भी सुविधा लोगो को दिख रही थी और आतंकवाद के नाम पर बेतुके बयान भी लोगो को चुभने लगे थे. ये सब फलीभूत हुआ आप पार्टी के दिल्ली चुनाव में. बाद में भी इन दोनों पार्टियों ने इस परिवर्तन को समझा लेकिन रवैया वही रहा. वो तो मोदी जी की लच्छेदार बाटे और कांग्रेस की अकर्मण्यता इसमें घी का कम कर गयी नहीं तो भाजपा आज इतनी मंबत स्थिति में नहीं होती. इन लोगो को इस जन जागरण के लिए राम देव, अन्ना और केजरीवाल का आभार व्यक्त करना चाहिए जिन्होंने इतने लम्बे समय तक दबी कुचली जनता को नागरिक बनाया. और इनके लिए कांग्रेस के घोटालो भरे शासन के खिलाफ जमीन तैयार कर के दी. असंतुष्टि और आक्रोश को पनपने म वक्त नहीं लगता भाई. अगर केजरीवाल जी बेतुकी बयानबाजी और हरकतों से बाज आ जाते तो अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं था. और आगे भी किस तरफ राजनीती जाती है कोई नहीं बता सकता. हाल की बारिश ने दिल्ली में भाजपा शासित MCD पर एक बार फिर सवालिया निशान लगा दिया है. आज के किसानो का आंदोलन भले ही राजनीती से प्रेरित हो पर कांग्रेस के वक्त भी ये राजनितिक ही था. अनाप शनाप बैंक चार्जेज, GST को लेकर भ्रांतिया भी काफी हद तक उस विकास के मुद्दे को भी पीछे कर रही है जिनपर भाजपा ने विजयरथ चढ़ा था. पाकिस्तान और राम मंदिर आज भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है पर पेट और सरकारी अमलो का भ्रष्टाचार आज भी महत्वपूर्ण हैं. ऐसे बहुत से मुद्दे आज भी वही के वही हैं जिसको पकड़ के केजरीवाल जी अपनी पार्टी को बाकि बचे 2 साल में एक नयी दिशा और पहचान दे दे जो की इन दोनों पार्टियों के कुचक्र में धूमिल पड़ गयी थी. आज भी दिल्ली के सरकारी अफसर आप पार्टी से सतर्क और भयभीत हैं वजह इनके कार्यकर्ताओ की हर डिपार्टमेंट के लोगो की निगहबानी. वार्ना दिल्ली जल बोर्ड जो की शीला जी के टाइम में पानी की कमी का रोना रोता रहता था आज ८० से ज्यादा कॉलोनियों में नै पाइप लाइन बिछाकर पानी भी दे रहा हैं. आज वही PWD सड़को पर दिख रही है. कुछ तो हैं जो इस सरकार से ये लोग सहमे हुए हैं. माकन बनते हुए पुलिस वाला नहीं नजर आ रहा हैं अगर गलती से आ गया तो आप के कार्यकर्त्ता जमा हो जाते हैं. एक आम आदमी को और क्या चाहिए ? अब सभी को काम और आसानी से मिलने वाले जनप्रतिनिधि जो उनकी बात सुने और काम भी हो.
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