Participating partners:


    बलात्कार और समाज

  • Sushil Kumar Verma
    Sushil Kumar Verma
    • Posted on April 15
    बलात्कार और समाज
    द्वापरयुग का दु:शासन तो पराजित कर दिया गया किन्तु आज का दु:शासन हर दिन विजयी हो रहा है श्री कृष्ण ने द्रोपदी के चीर को विस्तार देकर उस युग में ही सदैव के लिए स्त्री के सम्मान और महत्व को रेखांकित कर दिया था किन्तु आज वही चीर चिथड़ा बन गया |

    बड़े दुःख की बात है की अन्यानेक देवियों का लीलास्थल और सम्पूर्ण विश्व को जीवन दर्शन ,ज्ञान का प्रदाता भारत में स्त्री के स्त्रीत्व को लुटकर वह सड़क पर नग्न फेंकी जा रही है | सम्पूर्ण मानवता को कलंकित कर देने वाला दुष्कर्म दिन दुगुनी रात चौगुनी बढ़ रहा है | आगे –आगे बलात्कार की खबरें छपती जा रही है और पीछे –पीछे बलात्कार की खबरें बन रही है | बलात्कार कोई घटना नहीं बलात्कार एक स्त्री की आत्मा को रोंदकर उसके जन्मभर की नृशंस हत्या करने वाला ऐसा कुकर्म है ,जो कभी अतीत नहीं बनता | जहाँ स्त्री को श्रेष्ठ सर्वोपरि और पूर्वत्व प्रदात्री बताकर स्वयं शिव अर्धनारीश्वर कहलाए , हमारा देश भारत पिता नहीं , भारत माता कहलाया , वहाँ न आज दो माह की बच्ची सुरक्षित है और , न पैंतालिस वर्ष की माँ |

    इस विषय पर हम सरकार की बात नहीं करते क्योंकि उससे तो हमे केवल इस दुष्कर्म को कर चुके लोगो को कड़ा दण्ड देने की अपेक्षा है | इस निमित्त बड़ी संख्या में लोगो द्वारा पुरजोर प्रयास किये जा रहे है | हम तो उस मानव की बात कर रहे है ,जो वासना चलित पुतला बन चूका है | जिससे मानवता की सारी सीमाएं लांघ कर , नैतिकता को जलाकर स्वयं को हर उचित अनुचित कर्म के लिए स्वतंत्र कर लिया है ,जिसके लिए कोई अब ना बेटी है , न बहन |

    आखिर वो कौनसी कामनाएं और भाव है , जो किसी नारी को देखने के दृष्टिकोण में वासना को स्थापित कर देते है | कन्या के चरण धोकर नवदुर्गा की आराधना पूर्ण करने का भाव तब कहाँ गायब हो गया ,जब दो माह की बच्ची भी पशुता का शिकार बनी | कन्यादान करके कोटि दान का पुण्य बटोरने वाला वह पिता कैसा है ,जिसने अपने ही अंश को नोंच खाकर कोटि पाप एकत्रित कर लिए | वो भाई कैसा है , जिसने सहोदरा को ओरों से तो रक्षा का वचन दिया ,पर खुद ही ने भक्षक बनकर राखी के धागों को तार –तार कर डाला |

    जो कुकर्म कर चुके उसे फांसी की सजा मिले अथवा उन्हें नपुंसक बना दिया जाए , इस आशा से की दुष्कर्मी तो इस कुकृत्य की पुनरावृति कर ही नहीं सकेंगे ,पर जो करने की योजनाएं बनाए बैठे है ,वे इस कुविचार को दण्ड के भय से त्याग देंगे | हम भी मुक्त कण्ठ से इस मांग का समर्थन करते है | समाज में ऐसा कानून क्रियान्वित होना चाहिए की कुकर्मियो के लिए दुष्कर्म का विचार तक रोंगटे खड़े कर देने वाला बन जाए |

    ✍सुशील कुमार वर्मा
    1 People like this
    Post Comments Now
    Comments