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    झूठी आजादी

  • मोहित सक्सैना
    मोहित सक्सैना
    • Posted on August 12, 2017
    झूठी आजादी
    कैसे झूठी आजादी के सपनों में खो जाऊं,
    बन्धन में उलझा भारत हूँ मैं कैसे जश्न मनाऊं।

    पर आजादी का मौका है कुछ रस्म निभानी होंगी,
    कुछ उम्मीदें जागेंगी कुछ बात पुरानी होंगी।

    कुछ अतीत के धागों की परतें खोली जायेंगी,
    सच्चाई और देशप्रेम की कसमें ली जायेंगी।

    दिल्ली की सड़कों पर फिर से शक्ति प्रदर्शन होंगे,
    पर दूर किसी कस्बे गाँवों में करुण रुदन भी होंगे।

    लालकिले की प्राचीरों से कुछ सन्देश मिलेंगे,
    उम्मीदों के धागे से चिथड़ों को आज सिलेंगे।

    यूँ तो मेरी आजादी को बरस बहुत हो जायेंगे,
    कुछ रोटी को तरसेंगे कुछ भूखे सो जायेंगे।

    जेठ दुपहरी संसद के कमरे तो ठण्डे होंगे,
    वहीं विदर्भ के पेड़ों पर फांसी के फंदे होंगे।

    नुक्कड़ के बाज़ारों में तिरंगे खूब बिकेंगे,
    कुछ प्राचीरों पर लहराएँगे कुछ सड़कों पर बिखरेंगे।

    सत्ता की ज़ागीरों से भारत का भाग्य तराशेंगे,
    कुछ कचरे के ढेरों में अपना सौभाग्य तलाशेंगे।

    संसद के गलियारों में दिन-रात उजाले होंगे,
    पर गाँवों की रातों के सपने भी काले होंगे।

    टूटी सड़कों से होकर मंजिल तक कैसे जाऊं,
    बन्धन में उलझा भारत हूँ मैं कैसे जश्न मनाऊं।

    मोहित सक्सैना।
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