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    न बदलने की जिद पर अड़ा बदलता शहर

  • Vyomesh Chitravansh
    Vyomesh Chitravansh
    • Posted on January 8
    न बदलने की जिद पर अड़ा बदलता शहर
    व्योमवार्ता

    न बदलने की जिद पर अड़ा बदलता शहर

    हमारा शहर बनारस. युगों युगों से भी पुराना शहर. इतिहास से परे ,काल के चक्र के साथ अनवरत चलता हुआ. कहते हैं कि अविनाशी है काशी , जिसके इतिहास का न आदि है ना अंत. काशी का कौन है? यह भी एक नश्वर प्रश्न है . लोग आते गए, बसते रहे यहां की सोंधी माटी में जीवंत फक्कड़पन को अपनाकर बनारसी हो गए .यह खास से आम बनने यानी शहरी से बनारसी बनने की प्रक्रिया कब मन, तन और जीवन में स्वयं बस कर कब बाहरी से बनारसी बना देती है, यह तो बनने वाला भी नहीं जानता. ठीक वैसे ही जैसे कब गंगा को लेकर उत्तर के हिमालय से नीचे की ओर उतर रहे भगीरथ बनारस में आकर मॉ गंगा को मार्ग दिखाते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगे ,उन्हें भी नहीं पता. बनारस में गंगा दक्षिण से उत्तर गामिनी हो गई उत्तर गामिनी हुई गंगा को शहर बनारस ऐसा भाया किउन्होने पूरे शहर को अपनी गोद में ले आंचल में समेट लिया और यहां के रंग में ऐसे रंगी कि बिना गंगा के बनारस और बिना बनारस के गंगा की कल्पना ही बेमानी हो गई .एक बनारसी किस्से के अनुसार आशुतोष भगवान शंकर जब अपना घर बनाने के लिए दुनिया भर में जगहों का मुआयना तलाश कर रहे थे तो मॉ गंगा को उत्तर वाहिनी करने वाला यह शहर उन्हे बहुत पसंद आया .आये भी क्यों नहीं, खुद अड़भंगी जो ठहरे, तो उन्होंने अपना त्रिशूल यही गाड़ा और दाना पानी घर गृहस्थी सब लेकर बनारसी हो गए फिर उसके बाद का इतिहास बताता है कि सारे के सारे देवी देवता वीर योगिनी ब्रह्म भैरव शक्ति कपालिनी सभी उनके पीछे-पीछे यहीं आकर बस गए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में कोई देवी देवता प्राणी ऐसा नहीं जो बनारस में ना हो. लोगबाग की माने तो यहां लोगों से ज्यादा मंदिर मूर्तियां भगवान देवी देवता की है जो हर घर गली हर नुक्कड़ हर चौराहे से लेकर सड़क रेलवे लाइन अस्पताल स्कूल तक में आबाद है बाद में तुलसी कबीर कीनाराम जैसे महापुरूष भी यहीं के यहीं होकर रह गए. ग़ालिब साहब को बेमन से बनारस छोड़ना पड़ा तो उमरॉवजान अदा को यही जन्नत नसीब हुई. बाद के वर्षों में मुगल आये ब्रिटिश आये तो जो थोड़ी जगह बची थी उन्होंने उस पर अपने देवी-देवता पीरो व खुदाबंदो की याद में इबादत खाना बनवा दिया .अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च से जो जगह बची उस पर मठों,मांटेसरी ,दरगाह बना दिए गए .इन सब से भी कुछ बचा लोगों ने मकान बनवा लिया .अब इत्ती सी जगह में नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या? तो मकान बने पर उसे अपनी जरूरत व मनमाफिक के हिसाब से बनारसी ने बनवाया अब इस मनमाफिक व्यवस्था में कहां नक्शा कहां सेट बैक कहां फीडबैक कहां सनसेट के चक्कर में आम बनारसी पड़े .वह गली-कूचे मोहल्ले में मकान बनवा कर ही खुश रहने लगा ना तो आम बनारसी को दिक्कत न हीं उसके देवी देवता और परवरदिगार को .न हीं उसके यहॉ बिन बुलाए पहुंचने वाले साड़ों को और न छत पर बैठने वाले भक्तों को .समस्या तो तब हुई जब विकास प्राधिकरण ने पूरे शहर को अपने नक्शे पर उतारना शुरू किया .बनारसी में आज तक किसी की बात मानी कि वह विकास प्राधिकरण के नाज नक्से सहता. बस यही से बात बिगड़नी शुरू हो गई. विकास प्राधिकरण कहे कि मकान ऐसे नहीं ऐसे बनाओ, बनारसी पट्ठा कहता है, यार हम तो अपने मन से ही बनाएंगे, तुम्हारी ऐसी की तैसी .लिहाजा वाराणसी विकास प्राधिकरण ने एक बीच का रास्ता निकाला तुम हमारा ख्याल करो हम तुम्हारा बिल्कुल ख्याल रखना छोड़ देंगे. इस सिद्धांत का पालन आज तक दोनों तरफ से हो रहा है .बनारसी बंदा मकान बनाता है विकास प्राधिकरण वाले पहुंचकर काम रोकते हैं मकान गलत बन रहा है कल पन्ना लाल पार्क में आकर मिलो. दूसरे दिन बनारसी पन्ना लाल पार्क जाकर बताए हुए फलां कर्मचारी अधिकारी से मिलता है उसके मुताबिक उनका ख्याल रखने के लिए नगद नारायण का चढ़ावा देता है और फिर फ्री. मकान बनवाओ चाहे कुऑ खोदो. विकास प्राधिकरण नहीं आने वाला उसका ख्याल रखने के लिए. बस इसी सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था से बनारस कब आनंद कानन धर्म अध्यात्म ज्ञान और शिक्षा की नगरी से कंक्रीट के जंगलों में और वाराणसी विकास प्राधिकरण वाराणसी विनास प्राधिकरण में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला ,यही बात नगर निगम के साथ भी हुआ पर उसकी बात फिर कभी.
    तो साहेब पूरा बनारस अनियोजित व्यवस्थित शहर की श्रेणी में जाना जाने लगा फिर भी आम बनारसी को किसी से कोई शिकायत नहीं वह तो दिन भर नौकरी दुकानदारी जजमानी से खाली हो कर नुक्कड़ पर पान की दुकान पर अड़ी लगा अपनी मंडली में ज्ञान बांटने मे मस्त था,पचहत्तर के बाद जनमने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे या बेडरूम में लेटे हुये टीवी के रिमोट से छेड़छाड़ में व्यस्त होने की आदी हो चुकी थी.
    दिक्कत शुरू हुई सन 2014 के लोकसभा चुनाव से. शंकर, तुलसी ,रत्नाकर और गंगा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से चलकर बनारस लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय कर बैठे. मोदी जी बनारस आये तो उन्हें बनारस ने हाथों-हाथ लिया उनके नामांकन में पूरा शहर ही मानो सड़कों पर आशीर्वाद देने उमड़ पड़ा और मोदी जी बनारस के सांसद बन गए. पीएम बनने से पहले वह बाबा विश्वनाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने आए तब उन्होंने देखा कि बनारस तो महाजाल में फंसा हुआ है बिजली के खंभों से लेकर सड़क पर बह रहे सीवर के नालो तक .गंगा में गंदगी से लेकर सरकारी व्यवस्था से जूझते आम आदमी तक, ऐसे में कोई उन्हें बनारस मे लाने का श्रेय ले इससे पहले ही उन्होंने यह कह कर सभी नामचीन लोगों के होड़ देने पर विराम लगा दिया कि मुझे किसी ने नहीं बल्कि मां गंगा ने बुलाया है. बात यहीं तक थी तब भी ठीक था पर मोदी जी ने बनारस को बदलने की बात कहते हुए यह भी कर डाला कि मुझे मालूम है कि बनारस वालों से काम करना बहुत मुश्किल है .चलो साहब बात आई गई हो गई पर हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी जी हर तीसरे चौथे महीने बनारस का चक्कर मारने लगे अब लोकल अफसरान के साथ आम जनता भी अचरज में थी कि मोदी जी कैसे पी एम है जो पीएम होने के बावजूद हर तीसरे चौथे महीने अपने क्षेत्र का दौरा करते हैं .पर मोदी जी आते रहे. बनारस में बदलाव दिखने लगा .खंभे पर फैले तारों को जमीन के अंदर किए जाने की कवायद शुरु हुई तो एक लंबे अरसे से ठंडे बस्ते में पड़ा रिंग रोड का काम भी. बाबतपुर से शहर तक फोरलेन इंटरनेशनल लेवल रोड का काम जोर-शोर से शुरू हुआ .मड़ुआडीह और बनारस सिटी रेलवे स्टेशन को सैटेलाइट स्टेशन बनाने के साथ वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन को विस्तारित करने की योजनाएं भी लगभग पूर्ण होने को है और भी योजनाएं निर्माणाधीन हैं एवं धीरे धीरे बनारस बदलने को तैयार है पर इन सारे बदलाव के बाद भी नहीं बदला तो अपना शहर. यह अटपटा लग सकता है इतने सारे बदलाव की बात करने के बाद शहर के न बदलने की बात की जा रही है. जी हां बात शहर में रहने वाले शहरियों की है .मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस स्वच्छता नीति को प्रमुखता से सब को अपनाने की अपील की थी उस स्वच्छता को उन्हीं के संसदीय क्षेत्र का शहरी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा है,गंगा मे सफाई अभियान के तहत मोदी जी ने अस्सी घाट पर फावड़ा तक चलाया तो शहर में सफाई के लिए यहां की गलियों में झाड़ू लगाया पर उसका रत्तीभर असर हम बनारसियों के ऊपर नहीं पड़ा. आज भी घाटों पर गंदगी फैलाने ,गलियों में पॉलिथीन मे कूड़े फेंकने ,सड़कों दीवारों पर पान थूकने की आदतों में कोई बदलाव नहीं दिख रहा .कुछ दिनों के लिए डी एम बनकर आए विजय किरण आनंद के सख्ती का असर दिखा तो चाय पान की दुकान वालों ने दुकान के आगे कूड़े की टोकरी रखना व शाम को दुकान बंद करने से पहले दुकान के बाहर साफ सफाई करना प्रारंभ कर दिया था पर विजय किरण आनंद के जाने के बाद भी फिर पुराने ढर्रे पर आ गए. एसपी ट्रैफिक सुरेश चंद्र यादव पूरे शिद्दत से ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने में लगे हुए हैं पर शहरियों के के सहयोग न मिलने से उनकी सारी कवायद टॉय टॉय फिस्स हो रही है .वरुणा नदी के पेटे तक को पाट देने वाले बड़े आदमियों पर दिए उपाध्यक्ष पुलकित खरे ने निगॉहे उठाई तो उन लोगों ने खरे का ट्रांसफर ही करवा दिया .बार-बार हटाए जाने के बावजूद लगते हुए अतिक्रमण, अवैध पार्किंग, निजी अस्पतालों बड़ी बिल्डिंग के बेसमेंट की पार्किंग को खोले जाने के अभियान के बावजूद पुन: उनका व्यवसायिक उपयोग, सड़कों पर खड़े अपनी निर्देशों का उल्लंघन होते देखते बेबस ट्रैफिक पुलिस के सिपाही ,चौराहों पर बेकार मे जलते बूझते ट्रैफिक सिग्नल, पान की पीक से बदरंग दीवारें व सड़के, खाली बेकार पड़े मूत्रालय व दुकानों के पीछे उठते मल मूत्रों की महक इस पूरे बदलाव के नीयत पर सवाल खड़े करते हैं. जाहिर है हम बदलाव को अपनी आदत में शामिल नहीं करना चाहते और बदलते शहर में भी न बदलने की जिद पर अड़ा हुआ है अपना शहर .
    कहने को बहुत कुछ है पर अबकी बार इतना ही.
    शायर की नजर से कहें तो
    दिखावा मत कर मेरे शहर शरीफ होने का ,
    हम खामोश हैं लेकिन ना समझ तो नहीं
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