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    रुदाली

  • Vishnu Mohan
    Vishnu Mohan
    • Posted on July 11, 2016
    रुदाली
    रुदाली कोने में बैठी

    क्रंदन अब परिहास बना है
    वरमाला को तरसे वेदी
    बंधन भी अब फांस बना है
    कोई रोता बंधन में तो
    किसी के हिस्से रास मिला है
    रिश्ते तो अब खुद ही रिसते हैं
    ये कैसा विश्वास बना है
    मुक्त नाचता है अब यौवन
    रिश्तो को वनवास मिला है.
    परम्पराए रोती मिटटी को
    कैसा ये परिहास बना है
    आओ मिलकर सोचे कैसा
    जीवन का उल्लास बुना है
    रुदाली कोने में बैठी
    क्रंदन अब परिहास बना है
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