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    धुंआ धुंआ शहर

  • Rajesh Garg
    Rajesh Garg
    • Posted on November 7, 2016
    धुंआ धुंआ शहर
    धुंआ धुंआ शहर हमारा और हम खामोश हैं .
    जल रही है हर सख्श की आँखे क्या ये शमशान है
    आखिर इस तपिश के लिए हमी तो जिम्मेदार है
    बदलो खुद को कल के लिए गर हम इंसान हैं
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