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    कचरा उठाती लड़की

  • Pratap Pandey
    Pratap Pandey
    • Posted on September 13, 2015
    कचरा उठाती लड़की
    निःष्प्रभ ! किन्तु उदास नहीं
    हतप्रभ ! किन्तु निराश नहीं
    सड़क के किनारे लगे
    कूड़े के ढेर के पास
    खड़ी ।
    गहरी आँखों से
    कुछ ढूंढती ।
    फिर, सड़क पर जा रहे
    हँसते, खिलखिलाते
    धूल उड़ाते
    बच्चों को देखती ।
    फिर कुछ सोचकर
    अपनी नजरें
    फिर से अपने उद्देश्य पर टिकाती ।
    शायद ये ....
    ये सब मेरे लिए नहीं ।
    तभी उसकी कमल सी आँखों में
    उठती है इक चमक
    इक कचरे को देखकर ।
    आखिर
    कमल को हरबार
    कचरा ही क्यों मिलता है
    वह दौड़के उस कचरे को उठाती है
    जैसे उसे मोती मिल गया हो
    जैसे तालाब में किनारे पर
    कोई कमल खिल गया हो
    अपने कोमल हाथों से
    उस कचरे के खुरदरे
    पृष्ठ को साफ करती है
    एक कचरे को
    स्वच्छ करने की खातिर
    खुद को मलिन करती है
    जैसे वही उसके
    निःश्वास की आस हो ।
    फिर सड़क पर देखती है
    अब सड़क पर बच्चे नहीं हैं
    फिर, प्लास्टिक के टुकड़े को
    अपने थैले में रखती है
    और चल देती है
    दूसरे ढेर की ओर
    शायद अपने भाग्य को कोसते हुए
    ये सब तेरे कारण है
    बस यहीं तक है मेरी जिंदगी ।
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